काव्य दूर हुआ , रस-गंध सारे काफूर हो गए
कैसे लिखूं कविता वो पहले जैसी
कोमल भावनाएं सभी मुझसे दूर हो गए
खुद की असलियत छुपाये औरों से
अब तो अपने से छुपने को मजबूर हो गए
मायने बदल गए हर शय की अब तो
हम भी एक अच्छे सौदागर ज़रूर हो गए
औरों की सच्चाई देख कर क्यों लगता है
ये बेचारे व्यवहारीकता से दूर-दूर हो गए
