Monday, May 4, 2015

Patni ka Saath



                    'उसकी' '   'उससे'    बातें  
तुम कुछ भी कर सकते हो, जब चाहो अपने मन का ;
और मैं कुछ भी कभी नहीं, बिन मर्जी तेरे मन का ;
साथ चले थे हम दोनों थामे एक-दूजे का संग ;
मैं  तो रही वैसी ही बनी , पर बदला तेरा रंग ढंग
इन गुजरे लम्हों के तले , तुम हावी होते ही गए ;
लेकिन हम चुपचाप रहे और तुम्हे ढोते ही गए;
सौंप दिया हमने खुद को तुम्हारी हर एक मर्जी पर ;
पहचान तक अपनी भूल गयी, मार  दिया खुद को जी भर ;
अक्सर ही  कुछ और ज्यादा मुझसे हो तुम मांगते ;
सर्वस्व दे दिया हमने अब और फिर क्या चाहते ?
सुनते नहीं मेरी कुछ भी , अपनी ही सुनाते  हो रहते;
  मन मार,  सि लिए होठ , और  भला क्या हम  करते?
इतनी सी भर थी इच्छा की करो केवल मुझसे ही प्यार ;
जीतो तुम्ही मुझसे सदा , चाहूँ मैं  सब जाऊँ  हार ;
हो तुम पर अधिकार हमारा जैसा तेरा है मुझ पर ;
देखे मेरी नज़र तुम्हीको ,  तेरा  मुझ पर ही हो नज़र ;
जीवन की हर तपिस में तप कर , साथ जलूँगी मैं तेरे ;
वियावान अंधेरों में भी , साथ चलूंगी मैं तेरे ;
और ना कोई संग दिखेगा , जब तू देख नहीं पाएगा ;
तब भी मेरी नज़रों से सब कुछ तुम्हे नज़र आएगा ;
नहीं मिलेगा सुनने वाला , जब तुम सुन नहीं पाओगे
तब भी मेरी कानों से , तुम सब कुछ सुनते जाओगे
जीर्ण-शीर्ण , बदहाल दशा में जब पड़ोगे बिस्तर पर ;
मलीन मन , दुर्गंधित काया , बेबस जुबां , लाचार नज़र ;
घिन्न से सब मुँह बिचकाए , नज़रें फेरें , पास क्यों आएं ?
 तुम ख़ास रहोगे तब भी मेरे ; लिपटूंगी बाहें फैलाये।

Friday, May 1, 2015

SWACHHAND MAN

रहे स्वस्थ जब तक हो जीवन , सद्विचारों से हो पूर्ण मन 
लिप्त रहे सत्कर्मो में , होवे समुचित अर्थोपार्जन
सच्ची सादगी बनी रहे और ईमानदारी हो पूरी ,
रहें  निभाते ख़ुशी-ख़ुशी कर्तव्य जो भी हों ज़रूरी ,
क़र्ज़ न रहे किसी का सर पर, मुस्कान तैरती रहे अधर पर ,
उठे ना उँगली किसी की हम पर;   ऊँचा शीश रहे जीवन भर ,
दुर्गुण न एक भी छूने पाए , बुरी आदतें पास ना आएं ,
स्वछन्द मन झूमे खुशी से , कुछ ऐसा जीवन जिया जाए 

Tuesday, January 6, 2015

नयी किरण

फिर से नयी किरण है आयी , उमीदों की नयी पहल ;
 और हमने भी अब जान लिया की सूरज किधर से आत्ता है;
अँधेरे से डर अब  कैसा, अन्तर्मन में हुआ उजाला ,
तब से हमने मन लिया कि सूरज इधर से आता है !

Saturday, January 25, 2014

Hone do jo hue ja rahaa

इतनी फुर्सत कहाँ
कि तन्हाई में भी
बहा सकूं आँसू
अपने छुपे ज़ख्मों पर

उनसे नजरें मिलाने की हिम्मत कौन करे
अब तो खुद से भी नजरे छुपाने की नौबत है

डरता हूँ खुद ही से
जब भी तनहा रहता हूँ
कुछ हैं ऐसी बातें जिनको
सुनता हूँ मैं ही कहता हूँ

आसान -सी जिंदगी भी
बोझिल क्यों लगने लगती इतनी
कि हर कदम रखते ही
लगती है जमीन खिसकनी

अब कौन ढूंढे दुनिंया को
और लाखों शय इसके
मालूम नहीं खुद का ठिकाना
 भाग रहा पीछे किसके  ?

बस चली जा रही हैं साँसे , धडकता जा रहा है दिल
कटी जा रही जिंदगी यूं ही, मुस्किल-दर -मुस्किल

सच, मुझे नहीं पता ज़रा भी
कैसे-क्या हुए जा रहा है
करने को रहा और क्या
होने दो जो हुए जा रहा है  !

Friday, May 3, 2013




saap kewal use hee nahi kat ta jo uska dushman hota hai,
uske kareeb jane wala har shakhs khatre ke andar hota hai,
isme galtee saap ki nahi us insaan ki hai jo uske paas gayaa aur saap ko apna samjha
aur jab saap ne dansh maar diya phir yeh sochna ki humne saap ka kuchh nahi bigada tha
phir bhee saap ne mujhe kyon dansh maar diya, sabse badee galti hee thee saap ke kareeb jaana !

Tuesday, June 7, 2011

अपनी दुस्वारियां

आज शायद एक भूल हो गयी मुझसे जाने-अनजाने में जो तुम्हारी शिकायत कर डाली भरी मयखाने में
चाहता तो मै भी था अपनों से अपनापन निभाना मगर नाम आया मेरा भी बार-बार बेगाने में
कर के देख लिया पूरे सरे वादे हमने हासिल हुआ न कुछ भी वादे निभाने में
अब तो हसरत भी कोई बची नहीं इस दिल के आशियाने में
ज़माने से अलग रहते क्या जी कर के इस ज़माने में
कटती रही उम्र यूँही रूठने-मनाने में
रोता रहा मैं औरों को हसाने में
दर्द जो दिल में कर गया है घर जिंदगी भर के लिए शायद मिटता नहीं कुछ भी आजमाने में
हमने खुद को बहुत बार बदलने की कोशिश भी की मगर मात खाया हर बार उनको समझाने में

जिंदगी को जीने के दम पर निकले थे जो कफ़न बांध कर अपने सर , जनाज़ेदेख कर लगे है सर खुजलाने में
उनकी वफ़ा से आजिज़ आ कर सुकून मिलता है मुझे ज्यादा अब तो बे-वफाओं के किराए के घर जाने में