Saturday, January 25, 2014

Hone do jo hue ja rahaa

इतनी फुर्सत कहाँ
कि तन्हाई में भी
बहा सकूं आँसू
अपने छुपे ज़ख्मों पर

उनसे नजरें मिलाने की हिम्मत कौन करे
अब तो खुद से भी नजरे छुपाने की नौबत है

डरता हूँ खुद ही से
जब भी तनहा रहता हूँ
कुछ हैं ऐसी बातें जिनको
सुनता हूँ मैं ही कहता हूँ

आसान -सी जिंदगी भी
बोझिल क्यों लगने लगती इतनी
कि हर कदम रखते ही
लगती है जमीन खिसकनी

अब कौन ढूंढे दुनिंया को
और लाखों शय इसके
मालूम नहीं खुद का ठिकाना
 भाग रहा पीछे किसके  ?

बस चली जा रही हैं साँसे , धडकता जा रहा है दिल
कटी जा रही जिंदगी यूं ही, मुस्किल-दर -मुस्किल

सच, मुझे नहीं पता ज़रा भी
कैसे-क्या हुए जा रहा है
करने को रहा और क्या
होने दो जो हुए जा रहा है  !