Friday, May 21, 2010

जननी तुम जनो ऐसे जन

जननी तुम जनो ऐसे जन

जिनका हो सुगठित बदन और निश्चल मन

जो हों समाज के जीवंत और चौकस नयन

पुरुशत्वा से हों ओत-प्रोत और ज्ञान गहन

जिनकी सच्ची - मधुर वाणी हो और एक वचन

प्रेम करे सबसे, तनिक न हो इर्ष्या-डाह-जलन

भाल बने जो देश का अपने , हो जाये नाज़े-वतन

नाम ही जिसका का-पुरुषों में ला दे सिहरन

जिसके कपाल की तेज़ बनी रहे सदा अविच्चान्न

Monday, May 17, 2010


न जाने क्यों कर्महिनों को

आने वाला कल

शुभ और बेहतर लगता है

हमेशा ही

आज की अपेक्षा

जिसे वो संभल कर चाहते हैं रखना

भविष्य के ' सुंदर सपनों' की खातिर

या फिर उस क्रूर अतीत से बदला लेने के लिए

जिसका वो

बाल भी बांका नहीं कर सकते

उनका आज रह जाता है

मात्र एक मूक दर्शक बन कर

योजनाओं के बोझ से दब कर

जो मात्र चौबीस घंटों में

बालक से वृद्ध हो जाता है

और दम तोड़ देता है हो कर बे-बस लाचार

वो ही कर्महीन dhotein