जननी तुम जनो ऐसे जन
जिनका हो सुगठित बदन और निश्चल मन
जो हों समाज के जीवंत और चौकस नयन
पुरुशत्वा से हों ओत-प्रोत और ज्ञान गहन
जिनकी सच्ची - मधुर वाणी हो और एक वचन
प्रेम करे सबसे, तनिक न हो इर्ष्या-डाह-जलन
भाल बने जो देश का अपने , हो जाये नाज़े-वतन
नाम ही जिसका का-पुरुषों में ला दे सिहरन
जिसके कपाल की तेज़ बनी रहे सदा अविच्चान्न
