Friday, May 21, 2010

जननी तुम जनो ऐसे जन

जननी तुम जनो ऐसे जन

जिनका हो सुगठित बदन और निश्चल मन

जो हों समाज के जीवंत और चौकस नयन

पुरुशत्वा से हों ओत-प्रोत और ज्ञान गहन

जिनकी सच्ची - मधुर वाणी हो और एक वचन

प्रेम करे सबसे, तनिक न हो इर्ष्या-डाह-जलन

भाल बने जो देश का अपने , हो जाये नाज़े-वतन

नाम ही जिसका का-पुरुषों में ला दे सिहरन

जिसके कपाल की तेज़ बनी रहे सदा अविच्चान्न

Monday, May 17, 2010


न जाने क्यों कर्महिनों को

आने वाला कल

शुभ और बेहतर लगता है

हमेशा ही

आज की अपेक्षा

जिसे वो संभल कर चाहते हैं रखना

भविष्य के ' सुंदर सपनों' की खातिर

या फिर उस क्रूर अतीत से बदला लेने के लिए

जिसका वो

बाल भी बांका नहीं कर सकते

उनका आज रह जाता है

मात्र एक मूक दर्शक बन कर

योजनाओं के बोझ से दब कर

जो मात्र चौबीस घंटों में

बालक से वृद्ध हो जाता है

और दम तोड़ देता है हो कर बे-बस लाचार

वो ही कर्महीन dhotein

Tuesday, April 20, 2010


क्या पाएंगे हम दोनों एक दूजे से खफा हो कर


मई भी जलूँगा , तुम भी जलोगे


अपने भीतर ही भीतर खुद से लड़ेंगे
और अक्सर अकेले में तर्पेंगे
बैर कब शांती लाया दिलों के बीच


वह तो प्रेम मात्र से मिलती है


क्यों तोड़ें उस नाजुक कली को


कितने आरजू से जो खिलती है


हम खुश रहेंगे तेरे बिना


तुम भी तल्ख़ रहोगे मेरे बिना


फिर क्यों भेद करें आपस ही में


जबकि रह सकते हैं हम बैर के बिना


तुमने कभी कुछ कहा होगा


जो शायद मुझे नहीं भाया होगा


हमने भी ऐसा कुछ किया होगा


और तुम्हारा दिल दुखाया होगा


मगर क्या मुश्किल है इतना भी


उन सब बातो को भूल जाना


क्या इतना भी मुश्किल है सोचो


उन बातो को याद रखना दिल से


जिनकी यादें खुशियाँ दे जाती हैं


फिर क्यों हम रहे अकड़े- अकड़े









हमारे तुम्हारे बीच

वो क्या था - वो क्यों था हमारे बीच

अब भी समझने की कोशिश करता हूँ

तुम कैसे थे- मै कैसा था

अब तो याद करने से भी डरता हूँ

क्या जीवन था - कैसा जीवन था

अब उसे सपना ही समझता हूँ

तुम कौन थे- मैं कौन था

पहचानने से दोनों को मैं डरता हूँ

हम क्यों मिले - क्यों जुदा हुए

हर पल इसी उधेड़ बुन में रहता हूँ

तुम फिर कहीं न दिख जाओ मुझे

बच-बच कर हर गली से निकलता हूँ

भूल चूका मैं तुम्हे पूरी तरह से

क्यूँ बार-बार यही मै सबसे कहता हूँ

हामारे बीच कुछ भी तो नहीं था

हर घड़ी क्यूँ इस झूट को सहता हूँ

Tuesday, March 2, 2010


वो नहीं भूल सकते वहाँ जाने का सही वक़्त


जैसे कठमुल्ला को याद रहता ही नमाज़ का वक़्त


वो भीड़ में घुंस जाते हैं और अँगुलियों में नोटों को दबा कर


इतनी सिद्दत से , बेसब्री से अपना हाथ बढाते हैं


जैसे नवजात शिशु माँ के तरफ दूध के लिए देखता है


उनके दिमाग में बोतल की तस्वीर घूमती रहती है


जब तक उसे अपना कर अपनी पैंट के अन्दर डाल लें


फिर कुछ नमकीन , कुछ चटपटा, कुछ तेज, कुछ तीखा


परोस कर हम-प्यालों के संग, शुरू हो जाती दोड़े-महफ़िल


जोरदार ठहाकों के बीच , shurror chadhtee jaye


aur botal kee aukaat hee kitnee


bechaaree dhire-dhire ghatatee jaye


khatm huee jab saree botal


bhang ho gayaa moh usase


mayassar kara dee jaatee usko


kisee kudedaan kee


मेरा जीवन

ओ मेरी ख़ूबसूरत बेवफा जिन्दगी

तुझसे नफरत करता हूँ इतना जितना किसी से नहीं

क्यूँकी बिलकुल सही वक्त पर दगा दे जाती है तू

हर तमन्ना बन के रह जाती है अधूरी ख्वाब

इतना इंतज़ार कराती , इतना तडपाती है तू

सीना तोड़ देता पर्वतों का मैं और लाँघ जाता सागर को

अगर दखल न होता तेरे बदसूरत टांगो का राहों में

कौनहिम्मत दिखाता रोकने की मुझको बढ़ के आगे

अगर तेरी मनहूस सूरत दिखती न सबसे पहले मुझको

कायर नहीं था मैं तुझसे मिलने के पहले

था तेज़-उर्जा से भरा हुआ ,

था गुरूर मुझको अपने पर

जब तक तेरे छलावे में न था आया

हर बनता काम बिगाड़ा तुमने

हर मोड़ पर छकाया तुमने

सबके सामने मुझे गिराया तुमने

ओ मेरी बेशर्म हमसफ़र,

ओ मेरी गले की फाँस,

तेरे कारण न जाने कितने आंसू बहे

तेरे कारण हम हम न रहे

सुननी पडी उनकी भी जो मुंह दिखाने लायक न थे

झेलनी पडी उनकी जो खुद ही ज़िंदा शव-से थे

मगर ! वाह रे तेरी दरियादिली

वाह रे तेरी काबिलियत बर्बाद करने की

एक पल के लिए भी न भूली तू मुझको

और निभाती रही वफ़ाई आस्तीन के सांप - सी

मगर अब मैंने भी आजमा लिया है तुझको

और अब तो कोइ शिकवा-शिकायत भी नहीं

और अब कोइ तमन्ना भी नहीं, कोइ जरूरत भी नहीं

जो तेरे इंतज़ार में बैठा रहूँ, इतनी फुर्सत भी नहीं

हाँ, ग़म इसका ज़रूर रहेगा सालता मुझको हमेशा

की एक बे-वफ़ा को साथ रक्खा हमने अब तक

जिसके आगोश में कांटे ही कांटे भरे थे मेरे लिए

उसी को दामन से लगाए रहा था मैं अब तक

सितम भी ऐसा जो बयान ना कर सकूं किसी और से

आखिर तेरे सिवा कोई अपना भी तो नहीं मेरा

इसलिए निभाता रहूँगा है जब तक जीवन मेरा


Sunday, February 28, 2010

देश के नेता

इस देश की हवाओं में एक अजब सी बात है

जो चलते-चलते रूक जाती और रूक -रूक कर चलने लगतीं

इस देश की घटाओं का न अता-पता - ठिकाना

जो बिन मौसम लगें बरसने और मौसम में भी छुप जातीं

इस देश के नेताओं के अंदाज भी हैं अजीबोगरीब

कभी हवा तो कभी घटा बन , देश को उलझाया करते

जीवन होली

तुम ऐसा रंग डालो मुझ पर जो कर दे रंगीं मेरा मन

जिस पर और दूजा रंग चढ़े ना चाहे जितना हो जतन

तुम उस रंग में भिंगो डालो मुझको , ऐ मेरे यार

जो बिखेरे खुशबू और निस्वार्थ प्यार

मैं होली खेलूँ जीवन की जीवन से

सुध हो जब मन का मन से

तुम छा जाओ बन के घटा गुलालों की

और बर्षा करो जीवन में अमृत रस की

शायद तृप्त हो जाऊं उस पल में

जब बची न हो एक बूँद नीरस जीवन की