Monday, May 17, 2010


न जाने क्यों कर्महिनों को

आने वाला कल

शुभ और बेहतर लगता है

हमेशा ही

आज की अपेक्षा

जिसे वो संभल कर चाहते हैं रखना

भविष्य के ' सुंदर सपनों' की खातिर

या फिर उस क्रूर अतीत से बदला लेने के लिए

जिसका वो

बाल भी बांका नहीं कर सकते

उनका आज रह जाता है

मात्र एक मूक दर्शक बन कर

योजनाओं के बोझ से दब कर

जो मात्र चौबीस घंटों में

बालक से वृद्ध हो जाता है

और दम तोड़ देता है हो कर बे-बस लाचार

वो ही कर्महीन dhotein

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