वो नहीं भूल सकते वहाँ जाने का सही वक़्त
जैसे कठमुल्ला को याद रहता ही नमाज़ का वक़्त
वो भीड़ में घुंस जाते हैं और अँगुलियों में नोटों को दबा कर
इतनी सिद्दत से , बेसब्री से अपना हाथ बढाते हैं
जैसे नवजात शिशु माँ के तरफ दूध के लिए देखता है
उनके दिमाग में बोतल की तस्वीर घूमती रहती है
जब तक उसे अपना कर अपनी पैंट के अन्दर डाल न लें
फिर कुछ नमकीन , कुछ चटपटा, कुछ तेज, कुछ तीखा
परोस कर हम-प्यालों के संग, शुरू हो जाती दोड़े-महफ़िल
जोरदार ठहाकों के बीच , shurror chadhtee jaye
aur botal kee aukaat hee kitnee
bechaaree dhire-dhire ghatatee jaye
khatm huee jab saree botal
bhang ho gayaa moh usase
mayassar kara dee jaatee usko
kisee kudedaan kee

No comments:
Post a Comment