Tuesday, March 2, 2010


वो नहीं भूल सकते वहाँ जाने का सही वक़्त


जैसे कठमुल्ला को याद रहता ही नमाज़ का वक़्त


वो भीड़ में घुंस जाते हैं और अँगुलियों में नोटों को दबा कर


इतनी सिद्दत से , बेसब्री से अपना हाथ बढाते हैं


जैसे नवजात शिशु माँ के तरफ दूध के लिए देखता है


उनके दिमाग में बोतल की तस्वीर घूमती रहती है


जब तक उसे अपना कर अपनी पैंट के अन्दर डाल लें


फिर कुछ नमकीन , कुछ चटपटा, कुछ तेज, कुछ तीखा


परोस कर हम-प्यालों के संग, शुरू हो जाती दोड़े-महफ़िल


जोरदार ठहाकों के बीच , shurror chadhtee jaye


aur botal kee aukaat hee kitnee


bechaaree dhire-dhire ghatatee jaye


khatm huee jab saree botal


bhang ho gayaa moh usase


mayassar kara dee jaatee usko


kisee kudedaan kee


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